शुक्रवार, २४ अप्रैल २००९
कमजोर वन (सुरक्षा) प्रबन्धन की मार पड़ी इंदिरा आवास आवंटी पर
इंदिरा आवास आवंटी पर वन मुकदमा का घटनोत्तर जिक्र मैंने पूर्व के लेख में किया, लेकिन अब प्रश्न उठता है कि इस तरह की घटनाऐं आज भी पूरे भारतवर्ष में घट रहीं हैं जिसकी पृष्टभूमि की जाँच होनी चाहिए एवं सुधार के लिए आगे की कारवाई भी अपेक्षित है; जो नहीं हो रहा है। मैं तोपचाँची (गोमो, धनबाद) की पूर्व वर्णित घटना का बिन्दुवार विभागीय कार्य पद्धति का मूल्यांकन करने की कोशिश कर रहा हूँ कि आखिर इस इंदिरा आवास आवंटी पर वन मुकदमा की नौबत क्यों आई:-
Ø ऐसे दर्ज हुआ वन अपराध का अपराध प्रतिवेदन: अपराध प्रतिवेदन प्रस्तुती पर जब मैंने छानबिन किया था तो पाया कि इस मुकदमा को दर्ज करने के पीछे विभागीय कार्य पद्धति हीं कहीं न कहीं जिम्मेवार थी। हुआ ये था कि किसी व्यक्ति ने जिसकी आरोपी से अनबन रहती थी, उसने एक शिकायत वाद वन प्रमंडल पदाधिकारी, धनबाद के नाम से डाला कि प्रभारी वनरक्षी अनुचित लाभ लेकर जंगल की जमीन पर पक्का मकान बनवा रहा है। जबकि वस्तुस्थिति ये थी कि कार्य क्षेत्र बड़ा होने की वजह से वनरक्षी को मालुम हीं नहीं था कि वहाँ पर मकान बन रहा है। उक्त शिकायत वाद पर वन प्रमंडल पदाधिकारी ने एक प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा के पदाधिकारी को जाँच का जिम्मा दे दिया। प्रशिक्षु पदाधिकारी ने अनुभव की कमी के चलते वनरक्षी को को शंका की दृष्टि से देखा एवं जाँच के दरमियान साक्ष्य जमा करने के लिए गाँव में घुम-घुमकर व्यक्ति खोजना चाहा जबकि आरोपी का बयान दर्ज करने को तैयार नहीं हुए। वन पदाधिकारी के इस क्रिया-कलाप से वनरक्षी भयभीत हो गया एवं अपने को फंसा हुआ समझ कर बचाव के लिए एक पीछे के तिथि से आरोपी पर अपराध प्रतिवेदन काट दिया। जब जाँच पदाधिकारी दूसरे दिन नीचले स्तर पर कारवाई की जानकारी माँगी तो वनरक्षी ने अपराध प्रतिवेदन समर्पित करने की बात प्रकाश में लाया और इस खींचतान एवं फँसने-फँसाने के चक्कर में एक गरीब इंदिरा आवास आवंटी पर वन मुकदमा दर्ज हो गया।
Ø ऐसे बच गये प्रखंड विकास पदाधिकारी/कर्मचारी: दर्ज अपराध का जब मैने जाँच शुरू किया तो ये बात प्रकाश मे आयी कि इसके लिए प्रखंड विकास पदाधिकारी एवं कर्मचारी कम दोषी नहीं थे क्योंकि इंदिरा आवास के आवंटन की राशि उनके द्वारा दी गयी थी, जबकि प्रखंड कर्मचारी ने जमीन की मापी कर आरोपी को उसी जमीन पर मकान बनाने की अनुमति दी थी। मामला जब प्रकाश में आया तो कर्मचारी पूर्व की कारवाई से मुकर गया। मैंने जब अपने अनुसंधान पर उन्हें सह अभियुक्त बनाने की तैयारी पूरी कर ली तभी मुझे नियंत्रण पदाधिकारी से विचार-विमर्श हेतु बुलाहट आ गई एवं मुझे ऐसा करने से रोक दिया गया और कहा गया कि जो सीधे तौर पर दोषी है, उसी पर कारवाई करें। मैं इस तरह के निर्देश से अचम्भित था। मैं जब इस तरह के निर्देश के तह में गया तो पता चला कि प्रखंड विकास पदाधिकारी को अपने ऊपर कारवाई की भनक लग गयी थी एवं उन्होने नियंत्रण पदाधिकारी के पास पैरवी की थी कि मेरी एवं अन्य कर्मचारियों की नौकरी चली जायेगी। इस पिछ्ले दरवाजे की कारगुजारी कि जानकारी मुझे नहीं थी। इस तरह से अपना पल्ला झाड़ एवं नौकरी की दुहाई देकर सह आरोपी बच गये।
Ø यहीं पर वन सुरक्षा समिति के अधिकार काम आते: धनबाद वन प्रमंडल में उस वक्त वन सुरक्षा समिति शैशव काल में कहीं-कहीं था। वन सुरक्षा समिति की अहमियत नहीं थी। वर्तमान परिपेक्ष में देखा जाय तो आज 2007 के वन सुरक्षा समिति के अधिकार क्षेत्र में वनभूमि पर वन अपराध घटित होने पर प्रारम्भिक जाँचोपर्यंत प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार वन सुरक्षा समिति के पास है। अगर ये प्रावधान उस समय होते एवं सही ढ़ंग से लागू होते तो ये मुकदमा दर्ज हीं नहीं होता क्योंकि वन सुरक्षा समिति उस घटना को होने से रोक देती अथवा होता यूँ कि वन सुरक्षा समिति, जो उसी गाँव में 24 घंटे मौजूद रहती है, वह् स्वंय पहल कर बीच का रास्ता निकालती, तब वनरक्षी उक्त घटना का अपराध प्रतिवेदन सीधे मुझे समर्पित नहीं कर सकता।
अतः मैं कह सकता हूँ कि ग्रामीणों पर दोहरी मार पड़ रही है, एक तो वे सुरक्षित वन जिसपर उनका हक होना चाहिए था, उससे वंचित हैं, दूसरी ओर किसी छोटी सी भूल के लिए उन्हें भारी दण्ड का भागी भी बनना पड़ रहा है। आज भी वन सुरक्षा समिति के उक्त अधिकार को ग्रामीणों की जानकारी एवं अशिक्षा के वजह से समाप्त करने का षडयंत्र हो रहा है क्योंकि इससे वन विभाग का एकाधिकार जो समाप्त हो जायेगा। कोई भी आज के परिपेक्ष में जनभागिदारी को सच्चे मन से अंगीकार करना नहीं चाह रहा है, जो झारखण्ड के लिए दुःखद है।
लेख: प्रेम सागर सिंह [Prem Sagar Singh] , समय: ६:४० PM
Friday, April 23, 2010
भूखी रातों का सबक
भूखी रातों का सबक
हर्ष मंदर
बारिश थमने के साथ औरतें जुटने लगी हैं। फिर वे उस बेहद कठिन सबक के बारे में बात करने लगती हैं, जो उन्हें अपने बच्चों को सिखाना होता है। और यह सबक है कि भूखे कैसे सोया जाए। वे कहती हैं, ‘यदि हमारे पास थोड़ा भी खाना होता है तो हम उसे बच्चों को दे देते हैं। थोड़ा और खाना होने पर वह मर्दो की खुराक बन जाता है। औरतों को भूखे रहने की आदत होती है।’
पूर्वी उत्तरप्रदेश की एक निर्धन देहाती बस्ती में शाम गहरा रही है। बारिश से बचने के लिए हम एक छोटे से घर में शरण लेते हैं। फूस की टपकती छत के नीचे मिट्टी की ऊबड़-खाबड़ सतह पर झुंड में बैठी मुसहर औरतें बतिया रही हैं। वे बात कर रही हैं जमीन, रोजगार, भोजन और किसी उम्मीद के बिना जिंदगी की कठिनाइयों से जूझने के अलग-अलग रास्तों के बारे में। बारिश थमने के साथ ही और औरतें जुटने लगी हैं।
अब उनकी बातें बच्चों और उनकी परवरिश पर केंद्रित हो जाती हैं। और फिर वे उस बेहद कठिन सबक के बारे में बात करने लगती हैं, जो उन्हें अपने बच्चों को सिखाना होता है। और यह सबक है कि भूखे कैसे सोया जाए। ‘हफ्ते में आधा दिन हमें सब्जी या दाल के साथ रोटी या चावल नसीब होते हैं।
बाकी दिन केवल रोटी या नमक-हल्दी वाले उबले चावल के साथ काटने होते हैं। लेकिन महीने में चार या पांच दिन ऐसे होते हैं, जब हमारे पास खाने को कुछ नहीं होता। तब हमारे पास फाका करने के सिवा और कोई चारा नहीं होता। यदि हमारे पास थोड़ा भी खाना होता है तो हम उसे बच्चों को दे देते हैं। थोड़ा और खाना होने पर वह मर्दो की खुराक बन जाता है। औरतों को भूखे रहने की आदत होती है।’
महीने के उन उजड़े दिनों में, जब घर में न अन्न का एक दाना होता है और न करने को कोई काम, तब समूचा कुनबा खाने की तलाश में निकल पड़ता है। यदि नसीब ने साथ दिया तो दिन भर की तलाश के बाद मुट्ठी भर अनाज तो हासिल हो ही जाता है। इसे एक बड़े से बर्तन में उबाला जाता है ताकि ज्यादा का भ्रम पैदा किया जा सके।
लेकिन बच्चों के पेट अब भी खाली हैं और वे भोजन के लिए बेचैन हो रहे हैं। ‘हम उनके आंसू नहीं देख सकतीं,’ औरतें अपनी बात जारी रखती हैं। ‘जब बच्चों की तकलीफ बर्दाश्त के बाहर हो जाती है, तब हम तंबाकू मसलकर उन्हें अपनी अंगुलियां चूसने को दे देती हैं। इससे वे बिना कुछ खाए-पिए भी सो जाया करते हैं।
यदि बच्चे छोटे हों तो हमें उन्हें तब तक पीटना पड़ता है, जब तक वे रोते-रोते न सो जाएं। लेकिन बच्चों के बड़े होने पर हम उन्हें भूख के साथ जीना सिखाने की कोशिश करते हैं। यह एक ऐसा सबक है, जो जिंदगी भर उनके काम आएगा। क्योंकि हमें पता है कि भूख जीवन भर उन्हें सताने वाली है।’
जिन लोगों के लिए भूख जिंदगी की एक क्रूर सच्चाई है, उनसे बातचीत कर हम जैसे लोग उनकी स्थिति को थोड़ा समझ सकते हैं। उन लोगों से हुई इस बातचीत ने मुझे लगातार व्यग्र किया है। मैं बार-बार अपने कॉलम में इस विषय पर लिखता रहूंगा, ताकि आपको भी अपने साथ शामिल कर सकूं।
ओडीसा का एक बुजुर्ग विधुर अरखित दिन में एक दफे भात पका पाता है और वह भी तब, जब उसमें ऐसा कर सकने की ताकत बच पाती हो। यदि ऐसा न हो तो वह केवल काली चाय उबालकर पी लेता है और सो जाता है। आंध्रप्रदेश के एक बूढ़े सोमैया की दिनचर्या भोजन की तलाश करने तक सीमित है।
कभी-कभी उसके पड़ोसी उसे उबले हुए भात के साथ खाने को पतली दाल दे देते हैं। कई बूढ़े ऐसे भी हैं, जो गांव के सरकारी स्कूल में जाकर मध्याह्न् भोजन की दाल या सांभर की भीख मांगते हैं। एक बूढ़ी बेवा मालती बरिहा की पहुंच से मसाले बाहर हैं, लिहाजा वह चावल के साथ सालन नहीं खा पाती। अक्सर उसमें इतनी ताकत भी नहीं बची रह जाती कि वह ईंधन के लिए लकड़ियां जुटा सके। ऐसे मौकों पर उसे अधपके भात और आलू से ही काम चलाना होता है।
अंतम्मा बहुत पहले ही विधवा हो गई थी और उम्र बढ़ने पर बच्चों ने भी उसे छोड़ दिया। वह स्वीकारती है कि दिन के अधिकांश समय उसका ध्यान अगले जून की रोटी का जुगाड़ करने पर ही केंद्रित रहता है। अक्सर वो सोचती है कि भीख मांगना शुरू कर दे, लेकिन पड़ोसियों की कानाफूसी से उसे डर लगता है।
उसने एक दफे स्कूल जाकर भीख में मध्याह्न् भोजन का खाना मांगकर खाया था, लेकिन बाद में वह इस अपराध-बोध से भर गई कि उसने बच्चों के हिस्से का खाना खा लिया है। ओडीसा की एक विधवा महिला शंकरी छोटे और मुलायम बांसों को पीसकर भोजन के रूप में उनका इस्तेमाल करती है। भोजन का एक अन्य स्रोत है विषैला जंगली पौधा कड्डी, जिसे वह छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर एक थैली में दबाकर दिनभर के लिए नदी में रख देती है।
कड्डी का विषैलापन बह जाता है और शंकरी के परिवार को भोजन मिल जाता है। शंकरी के लिए जून और जुलाई के महीने अच्छे बीते थे क्योंकि इस दौरान वह थोल और कुसुम के जंगली फल जुटा पाई थी, जिनके एवज में उसे चावल की चूरी और नमक मिल गए। शंकरी के बच्चों को गोश्त का स्वाद केवल बारिश के दिनों में ही मिल पाता, जब वह उनके लिए घोंघे बटोरकर लाती।
जब उसमें खेतों में काम करने की क्षमता थी, तब उसे मेहनताने के तौर पर डेढ़ किलो महुआ मिला करता था। अब जबकि उसके बच्चे बड़े हो गए हैं और वह अकेली रह गई है, उसकी तकरीबन पूरी पेंशन भात खरीदने में ही खर्च हो जाती है। और वह भी महीने भर के लिए काफी नहीं होता।
75 बरस की बूढ़ी और जर्जर उड़िया बरिहा ने छुटपन में ही छोटी माता के चलते दोनों आंखें गंवा दी थीं। १५ साल की उम्र में वह यतीम हो गई। वह कहती है, तब से अब तक तमाम उम्र जिंदगी से जूझते हुए गुजर गई, लेकिन मौत ने अभी तक दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। उसका अधिकांश वक्त जंगलों में सूखी लकड़ियां बटोरते बीतता है।
इनमें से कुछ का उपयोग वह ईंधन के बतौर करती है और कुछ को बेच डालती है। फिर वह भात पकाती है और पानी या साग के साथ खाती है। शाम को वह गोशालाओं की सफाई करती है, जिसके बदले में उसे पका हुआ भात मिल जाता है। बीमारी या थकान के चलते जब वह काम नहीं कर पाती, तब उसके पास भीख मांगने के सिवा और कोई चारा नहीं होता।
धोनु बड़िया के भाई को १४ साल पहले जब यह पता चला कि धोनु को कुष्ठ है तो उसने उसे घर से निकाल बाहर कर दिया। तब से वह भीख मांगकर गुजारा करता रहा। ओडीसा के अकालग्रस्त जिले बोलंगीर के गांव बुरुमाल में एक छोटी-सी झोपड़ी में वह अकेले दिन गुजारता। सालों बाद स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के आग्रह पर धोनु के भाई ने उस पर तरस खाते हुए अपने घर की गोशाला के एक खुले बरामदे में उसे जगह दी। बकरियां चराने की एवज में धोनु का भाई उसे चावल की जरा सी बासी लपसी खाने को देता है।
धोनु को अपने अंगुली रहित हाथों से यह भोजन खाने में खासी कठिनाई होती है। उसे सरकार से पेंशन की आस है, ताकि उससे पेट भरने को पर्याप्त, ठोस भोजन प्राप्त कर सके। उसे अपना शरीर साफ करने के लिए साबुन की भी दरकार है। धोनु के सपनों की सरहद बस इतनी ही है।
हर्ष मंदर
बारिश थमने के साथ औरतें जुटने लगी हैं। फिर वे उस बेहद कठिन सबक के बारे में बात करने लगती हैं, जो उन्हें अपने बच्चों को सिखाना होता है। और यह सबक है कि भूखे कैसे सोया जाए। वे कहती हैं, ‘यदि हमारे पास थोड़ा भी खाना होता है तो हम उसे बच्चों को दे देते हैं। थोड़ा और खाना होने पर वह मर्दो की खुराक बन जाता है। औरतों को भूखे रहने की आदत होती है।’
पूर्वी उत्तरप्रदेश की एक निर्धन देहाती बस्ती में शाम गहरा रही है। बारिश से बचने के लिए हम एक छोटे से घर में शरण लेते हैं। फूस की टपकती छत के नीचे मिट्टी की ऊबड़-खाबड़ सतह पर झुंड में बैठी मुसहर औरतें बतिया रही हैं। वे बात कर रही हैं जमीन, रोजगार, भोजन और किसी उम्मीद के बिना जिंदगी की कठिनाइयों से जूझने के अलग-अलग रास्तों के बारे में। बारिश थमने के साथ ही और औरतें जुटने लगी हैं।
अब उनकी बातें बच्चों और उनकी परवरिश पर केंद्रित हो जाती हैं। और फिर वे उस बेहद कठिन सबक के बारे में बात करने लगती हैं, जो उन्हें अपने बच्चों को सिखाना होता है। और यह सबक है कि भूखे कैसे सोया जाए। ‘हफ्ते में आधा दिन हमें सब्जी या दाल के साथ रोटी या चावल नसीब होते हैं।
बाकी दिन केवल रोटी या नमक-हल्दी वाले उबले चावल के साथ काटने होते हैं। लेकिन महीने में चार या पांच दिन ऐसे होते हैं, जब हमारे पास खाने को कुछ नहीं होता। तब हमारे पास फाका करने के सिवा और कोई चारा नहीं होता। यदि हमारे पास थोड़ा भी खाना होता है तो हम उसे बच्चों को दे देते हैं। थोड़ा और खाना होने पर वह मर्दो की खुराक बन जाता है। औरतों को भूखे रहने की आदत होती है।’
महीने के उन उजड़े दिनों में, जब घर में न अन्न का एक दाना होता है और न करने को कोई काम, तब समूचा कुनबा खाने की तलाश में निकल पड़ता है। यदि नसीब ने साथ दिया तो दिन भर की तलाश के बाद मुट्ठी भर अनाज तो हासिल हो ही जाता है। इसे एक बड़े से बर्तन में उबाला जाता है ताकि ज्यादा का भ्रम पैदा किया जा सके।
लेकिन बच्चों के पेट अब भी खाली हैं और वे भोजन के लिए बेचैन हो रहे हैं। ‘हम उनके आंसू नहीं देख सकतीं,’ औरतें अपनी बात जारी रखती हैं। ‘जब बच्चों की तकलीफ बर्दाश्त के बाहर हो जाती है, तब हम तंबाकू मसलकर उन्हें अपनी अंगुलियां चूसने को दे देती हैं। इससे वे बिना कुछ खाए-पिए भी सो जाया करते हैं।
यदि बच्चे छोटे हों तो हमें उन्हें तब तक पीटना पड़ता है, जब तक वे रोते-रोते न सो जाएं। लेकिन बच्चों के बड़े होने पर हम उन्हें भूख के साथ जीना सिखाने की कोशिश करते हैं। यह एक ऐसा सबक है, जो जिंदगी भर उनके काम आएगा। क्योंकि हमें पता है कि भूख जीवन भर उन्हें सताने वाली है।’
जिन लोगों के लिए भूख जिंदगी की एक क्रूर सच्चाई है, उनसे बातचीत कर हम जैसे लोग उनकी स्थिति को थोड़ा समझ सकते हैं। उन लोगों से हुई इस बातचीत ने मुझे लगातार व्यग्र किया है। मैं बार-बार अपने कॉलम में इस विषय पर लिखता रहूंगा, ताकि आपको भी अपने साथ शामिल कर सकूं।
ओडीसा का एक बुजुर्ग विधुर अरखित दिन में एक दफे भात पका पाता है और वह भी तब, जब उसमें ऐसा कर सकने की ताकत बच पाती हो। यदि ऐसा न हो तो वह केवल काली चाय उबालकर पी लेता है और सो जाता है। आंध्रप्रदेश के एक बूढ़े सोमैया की दिनचर्या भोजन की तलाश करने तक सीमित है।
कभी-कभी उसके पड़ोसी उसे उबले हुए भात के साथ खाने को पतली दाल दे देते हैं। कई बूढ़े ऐसे भी हैं, जो गांव के सरकारी स्कूल में जाकर मध्याह्न् भोजन की दाल या सांभर की भीख मांगते हैं। एक बूढ़ी बेवा मालती बरिहा की पहुंच से मसाले बाहर हैं, लिहाजा वह चावल के साथ सालन नहीं खा पाती। अक्सर उसमें इतनी ताकत भी नहीं बची रह जाती कि वह ईंधन के लिए लकड़ियां जुटा सके। ऐसे मौकों पर उसे अधपके भात और आलू से ही काम चलाना होता है।
अंतम्मा बहुत पहले ही विधवा हो गई थी और उम्र बढ़ने पर बच्चों ने भी उसे छोड़ दिया। वह स्वीकारती है कि दिन के अधिकांश समय उसका ध्यान अगले जून की रोटी का जुगाड़ करने पर ही केंद्रित रहता है। अक्सर वो सोचती है कि भीख मांगना शुरू कर दे, लेकिन पड़ोसियों की कानाफूसी से उसे डर लगता है।
उसने एक दफे स्कूल जाकर भीख में मध्याह्न् भोजन का खाना मांगकर खाया था, लेकिन बाद में वह इस अपराध-बोध से भर गई कि उसने बच्चों के हिस्से का खाना खा लिया है। ओडीसा की एक विधवा महिला शंकरी छोटे और मुलायम बांसों को पीसकर भोजन के रूप में उनका इस्तेमाल करती है। भोजन का एक अन्य स्रोत है विषैला जंगली पौधा कड्डी, जिसे वह छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर एक थैली में दबाकर दिनभर के लिए नदी में रख देती है।
कड्डी का विषैलापन बह जाता है और शंकरी के परिवार को भोजन मिल जाता है। शंकरी के लिए जून और जुलाई के महीने अच्छे बीते थे क्योंकि इस दौरान वह थोल और कुसुम के जंगली फल जुटा पाई थी, जिनके एवज में उसे चावल की चूरी और नमक मिल गए। शंकरी के बच्चों को गोश्त का स्वाद केवल बारिश के दिनों में ही मिल पाता, जब वह उनके लिए घोंघे बटोरकर लाती।
जब उसमें खेतों में काम करने की क्षमता थी, तब उसे मेहनताने के तौर पर डेढ़ किलो महुआ मिला करता था। अब जबकि उसके बच्चे बड़े हो गए हैं और वह अकेली रह गई है, उसकी तकरीबन पूरी पेंशन भात खरीदने में ही खर्च हो जाती है। और वह भी महीने भर के लिए काफी नहीं होता।
75 बरस की बूढ़ी और जर्जर उड़िया बरिहा ने छुटपन में ही छोटी माता के चलते दोनों आंखें गंवा दी थीं। १५ साल की उम्र में वह यतीम हो गई। वह कहती है, तब से अब तक तमाम उम्र जिंदगी से जूझते हुए गुजर गई, लेकिन मौत ने अभी तक दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। उसका अधिकांश वक्त जंगलों में सूखी लकड़ियां बटोरते बीतता है।
इनमें से कुछ का उपयोग वह ईंधन के बतौर करती है और कुछ को बेच डालती है। फिर वह भात पकाती है और पानी या साग के साथ खाती है। शाम को वह गोशालाओं की सफाई करती है, जिसके बदले में उसे पका हुआ भात मिल जाता है। बीमारी या थकान के चलते जब वह काम नहीं कर पाती, तब उसके पास भीख मांगने के सिवा और कोई चारा नहीं होता।
धोनु बड़िया के भाई को १४ साल पहले जब यह पता चला कि धोनु को कुष्ठ है तो उसने उसे घर से निकाल बाहर कर दिया। तब से वह भीख मांगकर गुजारा करता रहा। ओडीसा के अकालग्रस्त जिले बोलंगीर के गांव बुरुमाल में एक छोटी-सी झोपड़ी में वह अकेले दिन गुजारता। सालों बाद स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के आग्रह पर धोनु के भाई ने उस पर तरस खाते हुए अपने घर की गोशाला के एक खुले बरामदे में उसे जगह दी। बकरियां चराने की एवज में धोनु का भाई उसे चावल की जरा सी बासी लपसी खाने को देता है।
धोनु को अपने अंगुली रहित हाथों से यह भोजन खाने में खासी कठिनाई होती है। उसे सरकार से पेंशन की आस है, ताकि उससे पेट भरने को पर्याप्त, ठोस भोजन प्राप्त कर सके। उसे अपना शरीर साफ करने के लिए साबुन की भी दरकार है। धोनु के सपनों की सरहद बस इतनी ही है।
Thursday, April 15, 2010
ये पाखंडी जनता के दुश्मन हैं
माओवाद के नाम पर अब तक का सबसे बड़ा पाखण्ड, भारत मे सक्रिय सबसे बड़े अपराधी-गिरोह ने आज दंतेवाडा मे किया है.खुद को माओवादी , नक्सलवादी लेनिनवादी कहने वाले इन पाखंडियों से मैंने अक्सर अपनी फील्ड पोस्टिंग के समय दास कैपिटल की शास्त्रीय भाषा मे शास्त्रार्थ किया है और कुछ प्रश्न पूछे हैं जो आज इस ब्लॉग के माध्यम से फिर पूछ रहा हूँ ..
ये प्रश्न इनके पापों का औचित्य बताने वाली श्रीमती अरुंधती राय और उन जैसे लोगो से भी पूछे जा रहे हैं जो सर्वहारा के इन सबसे बड़े और खतरनाक ऐतिहासिक दुश्मनों के भय से इनका बौद्धिक समर्थन करते हैं --
१.क्या १९४९ मे चीनी सेना के सहयोग से हुई माओवादी सशस्त्र क्रान्ति के बाद , दुनिया के किसी बड़े देश मे सशस्त्र क्रान्ति हुई है ?? यदि नहीं तो फिर यह असंभव स्वप्न दिखाकर सर्वहारा का बौद्धिक शोषण क्यों??
२.क्या आज के प्रबल वैज्ञानिक युग मे विश्व के राष्ट्रों के पास जो शस्त्र ( परमाणु बम जैसे महाविनाशकारी शस्त्र ) उपलब्ध है वैसे शस्त्र इन कथित माओवादियों के पास कभी भी हो सकते हैं ??
३.यदि नहीं तो क्या इस युग मे सशस्त्र क्रान्ति का स्वप्न दिखाकर युवाओं को एक मिथ्या और कभी न घटित हो सकने वाले सिद्धांत का अनुयायी बनाकर उनकी नियति के रूप मे उनका विनाश लिख देना मार्क्सवाद, लेनिनवाद , माओवाद, की ह्त्या नहीं है ??
४.जिस क्षेत्र मे नक्सलवादी अपनी ताकत के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे है क्या उस क्षेत्र मे वे सर्वहारा के लिए चलाई जा रही विकास योजनाओं से ३०% या उससे भी अधिक लेवी नहीं ले रहे ?? यदि ले रहे तो क्या यह उसी सर्वहारा का शोषण और उनका मांस भक्षण नहीं जिस सर्वहारा की मुक्ति की बात वे सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा करने का झूठा वादा और दावा कर रहे.??
ये प्रश्न और इनके उत्तर के रूप मे प्रश्नित-समूह का शाश्वत मौन यह बताता है कि इस देश मे मानसिक रूप से असंतुलित और विकृत लोगो का एक ताकतवर समूह इक्कीसवीं शताब्दी को समय-पूर्व ही पीछे छोड़ देने की ताकत रखने वाले भारत को, उस प्रस्तरयुगीन कालखंड मे ले जाना चाहता है जब जंगल का क़ानून मानवता के बौद्धिक सौन्दर्य को विकसित ही नहीं होने दे रहा था..
हमारे देश की संवैधानिक-व्यवस्था, जिन एजेंसियों के माध्यम से देश के समस्त नागरिको को आर्थिक न्याय दिलाना चाहती है वह भ्रष्ट हो चुकी है - यह सत्य है ..
यह सत्य है कि जिस पूर्व मध्यप्रदेश के दंतेवाडा मे इन पाखंडियो ने नरसंहार किया है उसी प्रदेश के एक आई ए एस अधिकारी और उसकी अधिकारी पत्नी के पास से कुछ ही दिन पूर्व आम जनता से लूटे हुए करोडो रुपये बरामद किये गए ..
यह सत्य है कि पूरे देश मे सरकारी अधिकारी जनता के पैसो की लूट के आरोपित हो रहे हैं ..
तो क्या इसका समाधान वही है जो दंतेवाडा मे या और जगहों पर इस अपराधी गिरोह द्वारा किया जा रहा है ..और क्या गारंटी है कि इन पाखंडियो के शाशन मे इनके अधिकारी भ्रष्टाचार नहीं करेगे ..
क्या अरुंधती राय या अन्य कोई भी माओवादी नेता यह बतायेगे कि नक्सलवादियो ने पिछले पांच वर्षों मे कितनी लेवी वसूली और उसका खर्च कैसे किया ??
क्या ये लोग अपने प्रभाव क्षेत्र के लोगो को अपनी आडिट रिपोर्ट देते हैं ? यदि ऐसा नहीं है तो ये लोग उन जंगली आदमखोर जानवरों से भी खतरनाक है जो अपने ही समूह के सदस्यों का मांस खाकर तृप्त होते है क्योकि ये मानवभक्षण का पाप जान बूझ कर कर रहे हैं .
यदि क्रान्ति करना है तो इस देश के नौजवानों को संगठित और शिक्षित करके उन्हें आई ए एस , आई पी एस जैसे महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर बैठकर ईमानदारी से आम जनता की सेवा करने का प्रशिक्षण दो ..
इन ताकतवर सेवाओं मे रह कर रिश्वत न लेकर दिखाओ तब क्रान्ति जैसे पवित्र शब्द का उच्चारण करो ..
मैंने पलामू, चतरा , गया जैसे नक्सलवाद प्रभावित जिलों के एस पी और डी आई जी के रूप मे इन पाखंडी माओवादियों के मिथ्याचार का पर्दाफ़ाश किया था और अब भी कर रहा हूँ.. मैंने पैम्फलेट प्रकाशित कराकर इन्हें बौद्धिक और व्यवहारिक स्तर पर कमज़ोर, पाखंडी और मिथ्याचारी साबित किया था..वह पैफ्लेट आप भी देखें..
मानवीय सभ्यता के ऊपर नक्सलवाद से बड़ा खतरा कभी नहीं पैदा हुआ क्योकि यह अतीत के सभी खतरों से अधिक पाखण्ड पूर्ण है..
--- अरविंद पाण्डेय
ये प्रश्न इनके पापों का औचित्य बताने वाली श्रीमती अरुंधती राय और उन जैसे लोगो से भी पूछे जा रहे हैं जो सर्वहारा के इन सबसे बड़े और खतरनाक ऐतिहासिक दुश्मनों के भय से इनका बौद्धिक समर्थन करते हैं --
१.क्या १९४९ मे चीनी सेना के सहयोग से हुई माओवादी सशस्त्र क्रान्ति के बाद , दुनिया के किसी बड़े देश मे सशस्त्र क्रान्ति हुई है ?? यदि नहीं तो फिर यह असंभव स्वप्न दिखाकर सर्वहारा का बौद्धिक शोषण क्यों??
२.क्या आज के प्रबल वैज्ञानिक युग मे विश्व के राष्ट्रों के पास जो शस्त्र ( परमाणु बम जैसे महाविनाशकारी शस्त्र ) उपलब्ध है वैसे शस्त्र इन कथित माओवादियों के पास कभी भी हो सकते हैं ??
३.यदि नहीं तो क्या इस युग मे सशस्त्र क्रान्ति का स्वप्न दिखाकर युवाओं को एक मिथ्या और कभी न घटित हो सकने वाले सिद्धांत का अनुयायी बनाकर उनकी नियति के रूप मे उनका विनाश लिख देना मार्क्सवाद, लेनिनवाद , माओवाद, की ह्त्या नहीं है ??
४.जिस क्षेत्र मे नक्सलवादी अपनी ताकत के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे है क्या उस क्षेत्र मे वे सर्वहारा के लिए चलाई जा रही विकास योजनाओं से ३०% या उससे भी अधिक लेवी नहीं ले रहे ?? यदि ले रहे तो क्या यह उसी सर्वहारा का शोषण और उनका मांस भक्षण नहीं जिस सर्वहारा की मुक्ति की बात वे सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा करने का झूठा वादा और दावा कर रहे.??
ये प्रश्न और इनके उत्तर के रूप मे प्रश्नित-समूह का शाश्वत मौन यह बताता है कि इस देश मे मानसिक रूप से असंतुलित और विकृत लोगो का एक ताकतवर समूह इक्कीसवीं शताब्दी को समय-पूर्व ही पीछे छोड़ देने की ताकत रखने वाले भारत को, उस प्रस्तरयुगीन कालखंड मे ले जाना चाहता है जब जंगल का क़ानून मानवता के बौद्धिक सौन्दर्य को विकसित ही नहीं होने दे रहा था..
हमारे देश की संवैधानिक-व्यवस्था, जिन एजेंसियों के माध्यम से देश के समस्त नागरिको को आर्थिक न्याय दिलाना चाहती है वह भ्रष्ट हो चुकी है - यह सत्य है ..
यह सत्य है कि जिस पूर्व मध्यप्रदेश के दंतेवाडा मे इन पाखंडियो ने नरसंहार किया है उसी प्रदेश के एक आई ए एस अधिकारी और उसकी अधिकारी पत्नी के पास से कुछ ही दिन पूर्व आम जनता से लूटे हुए करोडो रुपये बरामद किये गए ..
यह सत्य है कि पूरे देश मे सरकारी अधिकारी जनता के पैसो की लूट के आरोपित हो रहे हैं ..
तो क्या इसका समाधान वही है जो दंतेवाडा मे या और जगहों पर इस अपराधी गिरोह द्वारा किया जा रहा है ..और क्या गारंटी है कि इन पाखंडियो के शाशन मे इनके अधिकारी भ्रष्टाचार नहीं करेगे ..
क्या अरुंधती राय या अन्य कोई भी माओवादी नेता यह बतायेगे कि नक्सलवादियो ने पिछले पांच वर्षों मे कितनी लेवी वसूली और उसका खर्च कैसे किया ??
क्या ये लोग अपने प्रभाव क्षेत्र के लोगो को अपनी आडिट रिपोर्ट देते हैं ? यदि ऐसा नहीं है तो ये लोग उन जंगली आदमखोर जानवरों से भी खतरनाक है जो अपने ही समूह के सदस्यों का मांस खाकर तृप्त होते है क्योकि ये मानवभक्षण का पाप जान बूझ कर कर रहे हैं .
यदि क्रान्ति करना है तो इस देश के नौजवानों को संगठित और शिक्षित करके उन्हें आई ए एस , आई पी एस जैसे महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर बैठकर ईमानदारी से आम जनता की सेवा करने का प्रशिक्षण दो ..
इन ताकतवर सेवाओं मे रह कर रिश्वत न लेकर दिखाओ तब क्रान्ति जैसे पवित्र शब्द का उच्चारण करो ..
मैंने पलामू, चतरा , गया जैसे नक्सलवाद प्रभावित जिलों के एस पी और डी आई जी के रूप मे इन पाखंडी माओवादियों के मिथ्याचार का पर्दाफ़ाश किया था और अब भी कर रहा हूँ.. मैंने पैम्फलेट प्रकाशित कराकर इन्हें बौद्धिक और व्यवहारिक स्तर पर कमज़ोर, पाखंडी और मिथ्याचारी साबित किया था..वह पैफ्लेट आप भी देखें..
मानवीय सभ्यता के ऊपर नक्सलवाद से बड़ा खतरा कभी नहीं पैदा हुआ क्योकि यह अतीत के सभी खतरों से अधिक पाखण्ड पूर्ण है..
--- अरविंद पाण्डेय
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