विकास के लिए कोई भी सिद्धांत या दर्शन कितना भी ऊँचा या महान क्यूँ ना हो वह सदैव मानव चरित्र के अधीन रहता है..! इसलिए भारत के विकास के लिए सर्वप्रथम उचित है की यहाँ की जनता अपने चरित्र को सुधारे जिसके अंतर्गत अनैतिकता, विषयासक्ति और स्वार्थ का पूरी तरह लोप और ह्रास हो तथा नैतिक और विनम्रता युक्त चरित्र का वास हो..! तत्पश्चात व्यवस्था सुधार की बात आती है इसके लिए जरुरी है या तो व्यक्ति खुद जिम्मेदारी ले प्रशासनिक अधिकारी बन के या युवा नेता बन के, समाज सेवक बन के, नहीं तो फिर ये जिम्मेदारी जिस अधिकारी के पास है उसको ये भान करवाए की व्यवस्था में तात्कालिक दोष है जिसके लिए सम्बंधित अधिकारी के पास आवेदन करें या धरना प्रदर्शन करें..सुधार की बात कर के सिर्फ सुधार संभव नहीं इसके लिए कुछ करना पड़ता है..कुछ लोग pub और disco खोल के विकाश की बात कर रहे हैं कुछ प्रधान मंत्री जी या अपने राज्य के मुख्यमंत्री जी को पीटना चाहते है व्यवस्था में व्याप्त दोष के लिए..!! यदि अश्लीलता फैला के पश्चिमी देशो की भांति आर्थिक विकास कर भी लिया जाए महाशय तो नैतिक विकास संभव नहीं और अगर हम इंसान होते हुए भी इंसान नहीं बन सके तो इस आर्थिक विकास का दीर्घकालीन कोई लाभ नहीं..अंत में सभी स्वार्थ और विषय लोलुपता से ग्रसित आपस में लड़ पड़ेंगे..जो महाशय माननीय मुख्यमंत्री जी को पीटना चाहते हैं उन्हें बता दू की किसी को दंड देना बहुत आसान है परन्तु दंड का भागीदार बन ना बहुत मुश्किल...अगर सरकार गलत कर रही है तो हम उसके बराबर के भागिदार है क्यूंकि हम उसके अन्याय को बर्दाश्त कर रहे है क्यूंकि ये सरकार हमारी ही बनायीं हुई हैं..! मतदान करने के बाद हम भूल जाते हैं की विकाश के लिए भी कुछ करना है..क्या हम निजी संसथान में किसी शिक्षक को सिर्फ पैसा देकर आराम से सो जाते हैं की अब पढ़ाना उसकी जिम्मेदारी है हम भले ही सोते रहे कदापि नहीं हम देखते है की अगर हमने संसथान को इतना पैसा दिया है तो हमें उसके बदले इतनी पढाई चाहिए और अगर ना मिले तो शिक्षक के साथ संस्था का भी विरोध करते है लेकिन क्या मत का प्रयोग करने के बाद हम ये काम करते हैं , नहीं करते आराम से सो जाते है , कुछ गलत हुआ तो व्यवस्था को गाली देते है, नेताओ को गाली देते है , चौराहे पे बैठ क विकास की बात कर के समय व्यतीत करते हैं और जा के अपने घरो में सो जाते हैं.. युवा वर्ग इसके लिए सबसे जादा जिम्मेदार हैं..युवाओ में बढती भोग लिप्सा, निज कल्याण और स्वार्थ की भावना ने उनकी बुद्धि कुंद कर दी है वे भूल गए हैं की वे ना वर्तमान का नैतिक निर्माण कर रहे हैं ना भविष्य का..वे पश्चिमी सभ्यता में इतना रत हो रहे हैं की ये भूल रहे हैं की आने वाला भविष्य भी वैसा ही होगा जिसमे नैतिक चरित्र का लोप होगा और जैसा की मैंने आरम्भ में कहा है किसी भी सिद्धांत से केवल हम विकास नहीं कर सकते क्यूंकि वो सिद्धांत हमेशा से मानव चरित्र के अधीन है.. विद्या और बुद्धि अब सेवा के अधीन नहीं स्वार्थ के अधीन हो गए हैं, ये तत्त्व-निरूपण और विद्या-प्रसार के साधन ना होकर धनोपार्जन का मंत्र बन गए.. आइये हम मिल के प्रण करें की सिर्फ community की रोचकता बनाये रखने के लिए नहीं अपितु सचमुच विकाश के लिए कुछ कड़े कदम एक साथ मिल के उठाएं..!! ये सदैव याद रखें ज्ञानी, महान और अज्ञानी में फर्क केवल इतना है की ज्ञानी निति , सिद्धांत और दर्शन को व्यवहारिक जीवन में उतार के ही महान बनता है जबकि अज्ञानी और मूढ़ केवल ज्ञान की बातें करते हैं..! यदि मेरे लेख से किसी को भी निजी आघात पंहुचा हो तो मै क्षमा प्रार्थी हूँ..!! मेरा उद्धेश्य किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं..धन्यवाद्..!!
Rahul Ranjan...
Saturday, May 29, 2010
Friday, May 28, 2010
प्रिय प्रधानमंत्री जी!
प्रिय डॉ सिंह, सबसे पहले तो प्रधानमंत्री पद पर छह वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के लिए आपको ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं। इंदिरा गांधी के बाद आप सबसे ज्यादा समय तक अपनी सेवाएं देने वाले प्रधानमंत्री हैं।
‘परिस्थितियोंवश राजनीति में चले आए’ एक व्यक्ति के लिए यह सचमुच एक असाधारण उपलब्धि है। मैं एक अखबार के कॉलम के जरिए आपको पत्र लिखने के लिए माफी चाहता हूं, लेकिन चूंकि मैं आपकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हो सका, इसलिए मेरे जेहन में इस कॉलम के जरिए आपसे अपने दिमाग में घुमड़ रहे कुछ सवाल करने का ख्याल आया।
मैं अपने पहले सवाल से शुरू करता हूं। सीएनएन आईबीएन और हिंदुस्तान टाइम्स के पोल के मुताबिक यूपीए सरकार की दूसरी पारी को लेकर आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता है: बढ़ती हुई कीमतें। आपने कहा कि मुद्रास्फीति दिसंबर तक नियंत्रण में आ जाएगी। आप यह विस्तार से समझा सकते हैं कि आपके इस आत्मविश्वास का आधार क्या है क्योंकि ठीक ऐसा ही आश्वासन पिछले साल भी दिया गया था? साथ ही क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि क्या आप इस बात को स्वीकार करेंगे कि खाद्य व्यवस्था कुप्रबंधन की शिकार है? उदाहरण के लिए चीनी उद्योग को ही ले लीजिए, जहां बहुत कम सुधार हुआ है।
इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक पिछले साल गन्ने के उत्पादन में 9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। गन्ने की कमी का आसन्न संकट नजर आ रहा था, लेकिन विश्लेषणकर्ताओं का कहना है कि इसके बावजूद बाहर से चीनी आयात करने की अनुमति देने में तीन महीने की देरी हुई। अगले वर्ष ज्यादा चीनी का उत्पादन होने की संभावना है। यह एक अच्छा अवसर होगा, जब चीनी उद्योग पर से नियंत्रण खत्म हो सकेगा, चीनी का कोटा खत्म होगा और सरकार चीनी को खुले बाजार में बेचने के आदेश जारी कर सकेगी। निजी चीनी मिलें इस कदम का स्वागत करेंगी, लेकिन क्या को-ऑपरेटिव, जिन पर अप्रत्यक्ष रूप से कृषि मंत्री शरद पवार का मालिकाना है, वे इसके प्रति लचीला रुख अपनाएंगे?
फल और सब्जियों के दाम बढ़ने से खाद्य महंगाई ने और विकराल रूप धारण कर लिया है। क्या सरकार को किसानों के साथ खरीद-फरोख्त करने के लिए विदेशी व्यापारियों समेत बड़े खुदरा व्यापारियों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए ताकि किसान बाजार और कीमतों को लेकर निश्चिंत हो सकें। साथ ही किसान उपभोक्ताओं की जरूरतों के मुताबिक फसलें उगाने में विशेषज्ञता हासिल कर सकें।
राजनीतिक रूप से यह कदम विवादास्पद हो सकता है, लेकिन सत्ता में बने रहने के छह साल अब यह मांग करते हैं कि कुछ कठोर कदम उठाए जाएं और उन पर अडिग रहा जाए। क्या मैं आपसे यह भी पूछ सकता हूं कि बढ़ते अन्न भंडार, लेकिन चढ़ी हुई कीमतों के बीच जो विरोधाभास है, उससे आप किस तरह निपटेंगे? पिछले वर्ष चुनावों के कारण सरकार ने बहुत बड़े पैमाने पर गेंहू और चावल उपलब्ध करवाए थे। एक बहुत भयानक अकाल के बावजूद आज हम अनाज के विशालकाय ढेर पर बैठे हुए हैं।
हमारे संवाददाता ने देश भर में सरकारी गोदामों में सड़ रहे अनाजों के ऊपर कई रिपोर्टे प्रस्तुत कीं। विदेशों को गरीबी रेखा से भी नीचे के दामों पर अनाज बेचने के लिए वाजपेयी सरकार की कड़ी आलोचना हुई थी। अब आपकी सरकार की बारी है। सरकार मध्यवर्ती भंडार के लिए जितनी कीमत देती है (ताकि उपभोक्ताओं को कीमतों में बढ़ोतरी का सामना न करना पड़े) और किसानों को देने वाली कीमत (ताकि किसानों को मंदी से सुरक्षा दी जा सके), दोनों कीमतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। लेकिन आज ऐसा ही हो रहा है।
अब मुझे उस मुद्दे की ओर रुख करने की इजाजत दीजिए, जो आपके ही अनुसार आज हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है: नक्सलवाद का प्रसार। जैसाकि गृहमंत्री ने कहा, क्या यह सच है कि सरकार के पास माओवादियों से निपटने के लिए बहुत सीमित ‘अधिकार और शासनादेश’ हैं? साथ ही मैं यह पूछ सकता हूं कि क्या सरकार और कांग्रेस पार्टी के भीतर इस बात को लेकर कोई स्पष्ट चेतना है कि माओवादियों के खिलाफ इस युद्ध में जीत कैसे हासिल करनी है?
माओवादियों के खिलाफ यह लड़ाई भी किसी दूसरी लड़ाई की तरह ही लड़ी जानी चाहिए : स्पष्ट सोच और विचारों के साथ। दुर्भाग्य से हाल के हफ्तों किसी ने यह पता लगाया है कि निर्णयकर्ताओं के बीच इस मुद्दे को लेकर कुछ ऊहापोह और उलझन की स्थिति है। आपकी पार्टी का एक रसूखदार तबका इस बात पर जोर दे रहा है कि कोई सैन्य कार्रवाई करने से पहले नक्सलवाद के ‘मूल कारणों’ का विश्लेषण किया जाना चाहिए। गृहमंत्री खुद बल प्रयोग की आवश्यकता को लेकर सहमत जान पड़ते हैं, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ शब्दों की निजी लड़ाई में ही उलझे रहते हैं।
माओवादियों के पास जंगलों में बंदूकों का जखीरा है। उन्हें टेलीविजन स्टूडियो में ‘आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति’ से नहीं परास्त किया जा सकता। उन्हें बाकी सभी ‘हथियारबंद आतंकवादियों’ (हम उन्हें एक गुमराह युवावर्ग की तरह कतई नहीं देख सकते) की तरह सुप्रशिक्षित और समर्पित पुलिस बल के द्वारा ही परास्त किया जाना चाहिए। लेकिन जैसाकि बहुत से सुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि हमारा राज्य पुलिस बल और अर्धसैनिक बल न तो पूरी तरह हथियारों से लैस हैं और न ही उनमें अपने क्षेत्र में माओवादियों से निपटने की कोई अंत:प्रेरणा है।
सभी के लिए चिंता का तीसरा बड़ा मुद्दा है भ्रष्टाचार। सर, हमें आपकी नैतिक दृढ़ता पर संदेह नहीं है, लेकिन क्या आप स्वीकार करेंगे कि आपके लिए अपने ही मंत्रिमंडल के सहकर्मियों के बीच भ्रष्टाचार पर निगाह रखना मुश्किल है? साथ ही क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि यदि सीबीआई एक कांग्रेस मंत्री की जांच कर रही होती न कि डीएमके के सहयोगी ए राजा की तो क्या आप ऐसी ही उदारता दिखाते? मैं जानता हूं कि गठबंधन की राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं। जैसेकि जो भाजपा ए राजा के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही है, उससे पूछा जाना चाहिए कि उसने जयललिता के खिलाफ टैक्स की फाइलों का मुंह क्यों बंद कर दिया, क्योंकि उनके साथ भाजपा की सत्ता की साझेदारी थी। इन सबके बावजूद आपकी प्रशंसा किए जाने का सबसे बड़ा कारण है, सार्वजनिक जीवन में आपकी अडिग ईमानदारी और सत्यनिष्ठा। अब आप धृतराष्ट्र की तरह मंत्रिमंडल के भ्रष्टाचार के प्रति अपनी आंखें नहीं मूंद सकते।
सर, मैंने आपके सामने कुछ अधूरे कामों की सूची रख दी है। पाकिस्तान के मुद्दे से लेकर आर्थिक सुधारों तक बहुत कुछ किया जाना है।
पुनश्च : उम्मीद है कि मेरी कुछ जिज्ञासाओं का जवाब देने का वक्त आप निकाल पाएंगे। ऐसा करने के लिए आपको अगले वर्ष की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। एक खरा और साफगोई से भरा साक्षात्कार ही काफी होगा।
राजदीप सरदेसाई
लेखक सीएनएन 18 नेटवर्क के एडिटर- इन-चीफ हैं।
‘परिस्थितियोंवश राजनीति में चले आए’ एक व्यक्ति के लिए यह सचमुच एक असाधारण उपलब्धि है। मैं एक अखबार के कॉलम के जरिए आपको पत्र लिखने के लिए माफी चाहता हूं, लेकिन चूंकि मैं आपकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हो सका, इसलिए मेरे जेहन में इस कॉलम के जरिए आपसे अपने दिमाग में घुमड़ रहे कुछ सवाल करने का ख्याल आया।
मैं अपने पहले सवाल से शुरू करता हूं। सीएनएन आईबीएन और हिंदुस्तान टाइम्स के पोल के मुताबिक यूपीए सरकार की दूसरी पारी को लेकर आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता है: बढ़ती हुई कीमतें। आपने कहा कि मुद्रास्फीति दिसंबर तक नियंत्रण में आ जाएगी। आप यह विस्तार से समझा सकते हैं कि आपके इस आत्मविश्वास का आधार क्या है क्योंकि ठीक ऐसा ही आश्वासन पिछले साल भी दिया गया था? साथ ही क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि क्या आप इस बात को स्वीकार करेंगे कि खाद्य व्यवस्था कुप्रबंधन की शिकार है? उदाहरण के लिए चीनी उद्योग को ही ले लीजिए, जहां बहुत कम सुधार हुआ है।
इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक पिछले साल गन्ने के उत्पादन में 9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। गन्ने की कमी का आसन्न संकट नजर आ रहा था, लेकिन विश्लेषणकर्ताओं का कहना है कि इसके बावजूद बाहर से चीनी आयात करने की अनुमति देने में तीन महीने की देरी हुई। अगले वर्ष ज्यादा चीनी का उत्पादन होने की संभावना है। यह एक अच्छा अवसर होगा, जब चीनी उद्योग पर से नियंत्रण खत्म हो सकेगा, चीनी का कोटा खत्म होगा और सरकार चीनी को खुले बाजार में बेचने के आदेश जारी कर सकेगी। निजी चीनी मिलें इस कदम का स्वागत करेंगी, लेकिन क्या को-ऑपरेटिव, जिन पर अप्रत्यक्ष रूप से कृषि मंत्री शरद पवार का मालिकाना है, वे इसके प्रति लचीला रुख अपनाएंगे?
फल और सब्जियों के दाम बढ़ने से खाद्य महंगाई ने और विकराल रूप धारण कर लिया है। क्या सरकार को किसानों के साथ खरीद-फरोख्त करने के लिए विदेशी व्यापारियों समेत बड़े खुदरा व्यापारियों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए ताकि किसान बाजार और कीमतों को लेकर निश्चिंत हो सकें। साथ ही किसान उपभोक्ताओं की जरूरतों के मुताबिक फसलें उगाने में विशेषज्ञता हासिल कर सकें।
राजनीतिक रूप से यह कदम विवादास्पद हो सकता है, लेकिन सत्ता में बने रहने के छह साल अब यह मांग करते हैं कि कुछ कठोर कदम उठाए जाएं और उन पर अडिग रहा जाए। क्या मैं आपसे यह भी पूछ सकता हूं कि बढ़ते अन्न भंडार, लेकिन चढ़ी हुई कीमतों के बीच जो विरोधाभास है, उससे आप किस तरह निपटेंगे? पिछले वर्ष चुनावों के कारण सरकार ने बहुत बड़े पैमाने पर गेंहू और चावल उपलब्ध करवाए थे। एक बहुत भयानक अकाल के बावजूद आज हम अनाज के विशालकाय ढेर पर बैठे हुए हैं।
हमारे संवाददाता ने देश भर में सरकारी गोदामों में सड़ रहे अनाजों के ऊपर कई रिपोर्टे प्रस्तुत कीं। विदेशों को गरीबी रेखा से भी नीचे के दामों पर अनाज बेचने के लिए वाजपेयी सरकार की कड़ी आलोचना हुई थी। अब आपकी सरकार की बारी है। सरकार मध्यवर्ती भंडार के लिए जितनी कीमत देती है (ताकि उपभोक्ताओं को कीमतों में बढ़ोतरी का सामना न करना पड़े) और किसानों को देने वाली कीमत (ताकि किसानों को मंदी से सुरक्षा दी जा सके), दोनों कीमतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। लेकिन आज ऐसा ही हो रहा है।
अब मुझे उस मुद्दे की ओर रुख करने की इजाजत दीजिए, जो आपके ही अनुसार आज हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है: नक्सलवाद का प्रसार। जैसाकि गृहमंत्री ने कहा, क्या यह सच है कि सरकार के पास माओवादियों से निपटने के लिए बहुत सीमित ‘अधिकार और शासनादेश’ हैं? साथ ही मैं यह पूछ सकता हूं कि क्या सरकार और कांग्रेस पार्टी के भीतर इस बात को लेकर कोई स्पष्ट चेतना है कि माओवादियों के खिलाफ इस युद्ध में जीत कैसे हासिल करनी है?
माओवादियों के खिलाफ यह लड़ाई भी किसी दूसरी लड़ाई की तरह ही लड़ी जानी चाहिए : स्पष्ट सोच और विचारों के साथ। दुर्भाग्य से हाल के हफ्तों किसी ने यह पता लगाया है कि निर्णयकर्ताओं के बीच इस मुद्दे को लेकर कुछ ऊहापोह और उलझन की स्थिति है। आपकी पार्टी का एक रसूखदार तबका इस बात पर जोर दे रहा है कि कोई सैन्य कार्रवाई करने से पहले नक्सलवाद के ‘मूल कारणों’ का विश्लेषण किया जाना चाहिए। गृहमंत्री खुद बल प्रयोग की आवश्यकता को लेकर सहमत जान पड़ते हैं, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ शब्दों की निजी लड़ाई में ही उलझे रहते हैं।
माओवादियों के पास जंगलों में बंदूकों का जखीरा है। उन्हें टेलीविजन स्टूडियो में ‘आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति’ से नहीं परास्त किया जा सकता। उन्हें बाकी सभी ‘हथियारबंद आतंकवादियों’ (हम उन्हें एक गुमराह युवावर्ग की तरह कतई नहीं देख सकते) की तरह सुप्रशिक्षित और समर्पित पुलिस बल के द्वारा ही परास्त किया जाना चाहिए। लेकिन जैसाकि बहुत से सुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि हमारा राज्य पुलिस बल और अर्धसैनिक बल न तो पूरी तरह हथियारों से लैस हैं और न ही उनमें अपने क्षेत्र में माओवादियों से निपटने की कोई अंत:प्रेरणा है।
सभी के लिए चिंता का तीसरा बड़ा मुद्दा है भ्रष्टाचार। सर, हमें आपकी नैतिक दृढ़ता पर संदेह नहीं है, लेकिन क्या आप स्वीकार करेंगे कि आपके लिए अपने ही मंत्रिमंडल के सहकर्मियों के बीच भ्रष्टाचार पर निगाह रखना मुश्किल है? साथ ही क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि यदि सीबीआई एक कांग्रेस मंत्री की जांच कर रही होती न कि डीएमके के सहयोगी ए राजा की तो क्या आप ऐसी ही उदारता दिखाते? मैं जानता हूं कि गठबंधन की राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं। जैसेकि जो भाजपा ए राजा के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही है, उससे पूछा जाना चाहिए कि उसने जयललिता के खिलाफ टैक्स की फाइलों का मुंह क्यों बंद कर दिया, क्योंकि उनके साथ भाजपा की सत्ता की साझेदारी थी। इन सबके बावजूद आपकी प्रशंसा किए जाने का सबसे बड़ा कारण है, सार्वजनिक जीवन में आपकी अडिग ईमानदारी और सत्यनिष्ठा। अब आप धृतराष्ट्र की तरह मंत्रिमंडल के भ्रष्टाचार के प्रति अपनी आंखें नहीं मूंद सकते।
सर, मैंने आपके सामने कुछ अधूरे कामों की सूची रख दी है। पाकिस्तान के मुद्दे से लेकर आर्थिक सुधारों तक बहुत कुछ किया जाना है।
पुनश्च : उम्मीद है कि मेरी कुछ जिज्ञासाओं का जवाब देने का वक्त आप निकाल पाएंगे। ऐसा करने के लिए आपको अगले वर्ष की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। एक खरा और साफगोई से भरा साक्षात्कार ही काफी होगा।
राजदीप सरदेसाई
लेखक सीएनएन 18 नेटवर्क के एडिटर- इन-चीफ हैं।
Tuesday, May 18, 2010
दंतेवाड़ा नक्सली नरसंहार
..ऐसे तो मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगी जीत
(18th May 10)
विजय कुमार झा
न्यूज़ एडिटर
नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले में सोमवार की शाम एक बार फिर खूनी खेल खेला और 44 लोगों की जान ले ली। नक्सली हिंसा में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में आम नागरिकों के मारे जाने की यह संभवतः पहली घटना है। यह सरकार को नक्सलियों की खुली चुनौती है। ताजा घटना से नक्सलियों से लड़ाई के लिए सरकार की तैयारियों का भी अंदाज मिलता है। सरकार सोचती है और नक्सली कर के दिखा रहे हैं।
करीब डेढ़ महीने पहले ही नक्सलियों ने इसी इलाके में 76 जवानों को एक साथ मार कर सुरक्षा बलों को सबसे बड़ा झटका दिया था। उसके बाद भी वे इलाके में तीन-चार छोटी वारदात अंजाम दे चुके थे। कुल मिला कर नक्सलियों की मंशा सरकार को यह सन्देश देने की लगी है कि वे सरकार से डरे नहीं हैं और अपने 'मिशन' पर डटे हैं।
इस बार इतनी बड़ी संख्या में आम नागरिकों को निशाना बना कर नक्सलियों ने भी जोखिम लिया है। जो कुछ लोग उनसे सुहानूभूति रखते हैं, वे अपने रुख पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। यह निश्चित रूप से सरकार के पक्ष में जाएगा। बशर्ते सरकार तेजी से नक्सल प्रभावित इलाकों में लोगों का भरोसा जीतने की मजबूत पहल करे।
स्थानीय लोगों का भरोसा जीते बिना नक्सलियों से लड़ाई मुश्किल है और इसे जीतना तो नामुमकिन है। इसलिए लोगों का भरोसा जीतना लड़ाई का पहला मोर्चा होना चाहिए। ऑपरेशन ग्रीन हंट की सफलता का भी पहला सूत्र यही है। सरकार को चाहिए कि वह पहले नक्सल प्रभावित इलाके में विकास कि पहल करे, फिर जनता को सुरक्षा का भरोसा दिलाये और तब लोगों का सहयोग लेकर नक्सलियों की ताकत कुचल दे।
..ऐसे तो मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगी जीत
(18th May 10)
विजय कुमार झा
न्यूज़ एडिटर
नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले में सोमवार की शाम एक बार फिर खूनी खेल खेला और 44 लोगों की जान ले ली। नक्सली हिंसा में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में आम नागरिकों के मारे जाने की यह संभवतः पहली घटना है। यह सरकार को नक्सलियों की खुली चुनौती है। ताजा घटना से नक्सलियों से लड़ाई के लिए सरकार की तैयारियों का भी अंदाज मिलता है। सरकार सोचती है और नक्सली कर के दिखा रहे हैं।
करीब डेढ़ महीने पहले ही नक्सलियों ने इसी इलाके में 76 जवानों को एक साथ मार कर सुरक्षा बलों को सबसे बड़ा झटका दिया था। उसके बाद भी वे इलाके में तीन-चार छोटी वारदात अंजाम दे चुके थे। कुल मिला कर नक्सलियों की मंशा सरकार को यह सन्देश देने की लगी है कि वे सरकार से डरे नहीं हैं और अपने 'मिशन' पर डटे हैं।
इस बार इतनी बड़ी संख्या में आम नागरिकों को निशाना बना कर नक्सलियों ने भी जोखिम लिया है। जो कुछ लोग उनसे सुहानूभूति रखते हैं, वे अपने रुख पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। यह निश्चित रूप से सरकार के पक्ष में जाएगा। बशर्ते सरकार तेजी से नक्सल प्रभावित इलाकों में लोगों का भरोसा जीतने की मजबूत पहल करे।
स्थानीय लोगों का भरोसा जीते बिना नक्सलियों से लड़ाई मुश्किल है और इसे जीतना तो नामुमकिन है। इसलिए लोगों का भरोसा जीतना लड़ाई का पहला मोर्चा होना चाहिए। ऑपरेशन ग्रीन हंट की सफलता का भी पहला सूत्र यही है। सरकार को चाहिए कि वह पहले नक्सल प्रभावित इलाके में विकास कि पहल करे, फिर जनता को सुरक्षा का भरोसा दिलाये और तब लोगों का सहयोग लेकर नक्सलियों की ताकत कुचल दे।
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