प्रिय डॉ सिंह, सबसे पहले तो प्रधानमंत्री पद पर छह वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के लिए आपको ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं। इंदिरा गांधी के बाद आप सबसे ज्यादा समय तक अपनी सेवाएं देने वाले प्रधानमंत्री हैं।
‘परिस्थितियोंवश राजनीति में चले आए’ एक व्यक्ति के लिए यह सचमुच एक असाधारण उपलब्धि है। मैं एक अखबार के कॉलम के जरिए आपको पत्र लिखने के लिए माफी चाहता हूं, लेकिन चूंकि मैं आपकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हो सका, इसलिए मेरे जेहन में इस कॉलम के जरिए आपसे अपने दिमाग में घुमड़ रहे कुछ सवाल करने का ख्याल आया।
मैं अपने पहले सवाल से शुरू करता हूं। सीएनएन आईबीएन और हिंदुस्तान टाइम्स के पोल के मुताबिक यूपीए सरकार की दूसरी पारी को लेकर आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता है: बढ़ती हुई कीमतें। आपने कहा कि मुद्रास्फीति दिसंबर तक नियंत्रण में आ जाएगी। आप यह विस्तार से समझा सकते हैं कि आपके इस आत्मविश्वास का आधार क्या है क्योंकि ठीक ऐसा ही आश्वासन पिछले साल भी दिया गया था? साथ ही क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि क्या आप इस बात को स्वीकार करेंगे कि खाद्य व्यवस्था कुप्रबंधन की शिकार है? उदाहरण के लिए चीनी उद्योग को ही ले लीजिए, जहां बहुत कम सुधार हुआ है।
इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक पिछले साल गन्ने के उत्पादन में 9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। गन्ने की कमी का आसन्न संकट नजर आ रहा था, लेकिन विश्लेषणकर्ताओं का कहना है कि इसके बावजूद बाहर से चीनी आयात करने की अनुमति देने में तीन महीने की देरी हुई। अगले वर्ष ज्यादा चीनी का उत्पादन होने की संभावना है। यह एक अच्छा अवसर होगा, जब चीनी उद्योग पर से नियंत्रण खत्म हो सकेगा, चीनी का कोटा खत्म होगा और सरकार चीनी को खुले बाजार में बेचने के आदेश जारी कर सकेगी। निजी चीनी मिलें इस कदम का स्वागत करेंगी, लेकिन क्या को-ऑपरेटिव, जिन पर अप्रत्यक्ष रूप से कृषि मंत्री शरद पवार का मालिकाना है, वे इसके प्रति लचीला रुख अपनाएंगे?
फल और सब्जियों के दाम बढ़ने से खाद्य महंगाई ने और विकराल रूप धारण कर लिया है। क्या सरकार को किसानों के साथ खरीद-फरोख्त करने के लिए विदेशी व्यापारियों समेत बड़े खुदरा व्यापारियों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए ताकि किसान बाजार और कीमतों को लेकर निश्चिंत हो सकें। साथ ही किसान उपभोक्ताओं की जरूरतों के मुताबिक फसलें उगाने में विशेषज्ञता हासिल कर सकें।
राजनीतिक रूप से यह कदम विवादास्पद हो सकता है, लेकिन सत्ता में बने रहने के छह साल अब यह मांग करते हैं कि कुछ कठोर कदम उठाए जाएं और उन पर अडिग रहा जाए। क्या मैं आपसे यह भी पूछ सकता हूं कि बढ़ते अन्न भंडार, लेकिन चढ़ी हुई कीमतों के बीच जो विरोधाभास है, उससे आप किस तरह निपटेंगे? पिछले वर्ष चुनावों के कारण सरकार ने बहुत बड़े पैमाने पर गेंहू और चावल उपलब्ध करवाए थे। एक बहुत भयानक अकाल के बावजूद आज हम अनाज के विशालकाय ढेर पर बैठे हुए हैं।
हमारे संवाददाता ने देश भर में सरकारी गोदामों में सड़ रहे अनाजों के ऊपर कई रिपोर्टे प्रस्तुत कीं। विदेशों को गरीबी रेखा से भी नीचे के दामों पर अनाज बेचने के लिए वाजपेयी सरकार की कड़ी आलोचना हुई थी। अब आपकी सरकार की बारी है। सरकार मध्यवर्ती भंडार के लिए जितनी कीमत देती है (ताकि उपभोक्ताओं को कीमतों में बढ़ोतरी का सामना न करना पड़े) और किसानों को देने वाली कीमत (ताकि किसानों को मंदी से सुरक्षा दी जा सके), दोनों कीमतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। लेकिन आज ऐसा ही हो रहा है।
अब मुझे उस मुद्दे की ओर रुख करने की इजाजत दीजिए, जो आपके ही अनुसार आज हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है: नक्सलवाद का प्रसार। जैसाकि गृहमंत्री ने कहा, क्या यह सच है कि सरकार के पास माओवादियों से निपटने के लिए बहुत सीमित ‘अधिकार और शासनादेश’ हैं? साथ ही मैं यह पूछ सकता हूं कि क्या सरकार और कांग्रेस पार्टी के भीतर इस बात को लेकर कोई स्पष्ट चेतना है कि माओवादियों के खिलाफ इस युद्ध में जीत कैसे हासिल करनी है?
माओवादियों के खिलाफ यह लड़ाई भी किसी दूसरी लड़ाई की तरह ही लड़ी जानी चाहिए : स्पष्ट सोच और विचारों के साथ। दुर्भाग्य से हाल के हफ्तों किसी ने यह पता लगाया है कि निर्णयकर्ताओं के बीच इस मुद्दे को लेकर कुछ ऊहापोह और उलझन की स्थिति है। आपकी पार्टी का एक रसूखदार तबका इस बात पर जोर दे रहा है कि कोई सैन्य कार्रवाई करने से पहले नक्सलवाद के ‘मूल कारणों’ का विश्लेषण किया जाना चाहिए। गृहमंत्री खुद बल प्रयोग की आवश्यकता को लेकर सहमत जान पड़ते हैं, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ शब्दों की निजी लड़ाई में ही उलझे रहते हैं।
माओवादियों के पास जंगलों में बंदूकों का जखीरा है। उन्हें टेलीविजन स्टूडियो में ‘आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति’ से नहीं परास्त किया जा सकता। उन्हें बाकी सभी ‘हथियारबंद आतंकवादियों’ (हम उन्हें एक गुमराह युवावर्ग की तरह कतई नहीं देख सकते) की तरह सुप्रशिक्षित और समर्पित पुलिस बल के द्वारा ही परास्त किया जाना चाहिए। लेकिन जैसाकि बहुत से सुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि हमारा राज्य पुलिस बल और अर्धसैनिक बल न तो पूरी तरह हथियारों से लैस हैं और न ही उनमें अपने क्षेत्र में माओवादियों से निपटने की कोई अंत:प्रेरणा है।
सभी के लिए चिंता का तीसरा बड़ा मुद्दा है भ्रष्टाचार। सर, हमें आपकी नैतिक दृढ़ता पर संदेह नहीं है, लेकिन क्या आप स्वीकार करेंगे कि आपके लिए अपने ही मंत्रिमंडल के सहकर्मियों के बीच भ्रष्टाचार पर निगाह रखना मुश्किल है? साथ ही क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि यदि सीबीआई एक कांग्रेस मंत्री की जांच कर रही होती न कि डीएमके के सहयोगी ए राजा की तो क्या आप ऐसी ही उदारता दिखाते? मैं जानता हूं कि गठबंधन की राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं। जैसेकि जो भाजपा ए राजा के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही है, उससे पूछा जाना चाहिए कि उसने जयललिता के खिलाफ टैक्स की फाइलों का मुंह क्यों बंद कर दिया, क्योंकि उनके साथ भाजपा की सत्ता की साझेदारी थी। इन सबके बावजूद आपकी प्रशंसा किए जाने का सबसे बड़ा कारण है, सार्वजनिक जीवन में आपकी अडिग ईमानदारी और सत्यनिष्ठा। अब आप धृतराष्ट्र की तरह मंत्रिमंडल के भ्रष्टाचार के प्रति अपनी आंखें नहीं मूंद सकते।
सर, मैंने आपके सामने कुछ अधूरे कामों की सूची रख दी है। पाकिस्तान के मुद्दे से लेकर आर्थिक सुधारों तक बहुत कुछ किया जाना है।
पुनश्च : उम्मीद है कि मेरी कुछ जिज्ञासाओं का जवाब देने का वक्त आप निकाल पाएंगे। ऐसा करने के लिए आपको अगले वर्ष की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। एक खरा और साफगोई से भरा साक्षात्कार ही काफी होगा।
राजदीप सरदेसाई
लेखक सीएनएन 18 नेटवर्क के एडिटर- इन-चीफ हैं।
Friday, May 28, 2010
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