Saturday, May 29, 2010

मानव चरित्र से ही विकास संभव...

विकास के लिए कोई भी सिद्धांत या दर्शन कितना भी ऊँचा या महान क्यूँ ना हो वह सदैव मानव चरित्र के अधीन रहता है..! इसलिए भारत के विकास के लिए सर्वप्रथम उचित है की यहाँ की जनता अपने चरित्र को सुधारे जिसके अंतर्गत अनैतिकता, विषयासक्ति और स्वार्थ का पूरी तरह लोप और ह्रास हो तथा नैतिक और विनम्रता युक्त चरित्र का वास हो..! तत्पश्चात व्यवस्था सुधार की बात आती है इसके लिए जरुरी है या तो व्यक्ति खुद जिम्मेदारी ले प्रशासनिक अधिकारी बन के या युवा नेता बन के, समाज सेवक बन के, नहीं तो फिर ये जिम्मेदारी जिस अधिकारी के पास है उसको ये भान करवाए की व्यवस्था में तात्कालिक दोष है जिसके लिए सम्बंधित अधिकारी के पास आवेदन करें या धरना प्रदर्शन करें..सुधार की बात कर के सिर्फ सुधार संभव नहीं इसके लिए कुछ करना पड़ता है..कुछ लोग pub और disco खोल के विकाश की बात कर रहे हैं कुछ प्रधान मंत्री जी या अपने राज्य के मुख्यमंत्री जी को पीटना चाहते है व्यवस्था में व्याप्त दोष के लिए..!! यदि अश्लीलता फैला के पश्चिमी देशो की भांति आर्थिक विकास कर भी लिया जाए महाशय तो नैतिक विकास संभव नहीं और अगर हम इंसान होते हुए भी इंसान नहीं बन सके तो इस आर्थिक विकास का दीर्घकालीन कोई लाभ नहीं..अंत में सभी स्वार्थ और विषय लोलुपता से ग्रसित आपस में लड़ पड़ेंगे..जो महाशय माननीय मुख्यमंत्री जी को पीटना चाहते हैं उन्हें बता दू की किसी को दंड देना बहुत आसान है परन्तु दंड का भागीदार बन ना बहुत मुश्किल...अगर सरकार गलत कर रही है तो हम उसके बराबर के भागिदार है क्यूंकि हम उसके अन्याय को बर्दाश्त कर रहे है क्यूंकि ये सरकार हमारी ही बनायीं हुई हैं..! मतदान करने के बाद हम भूल जाते हैं की विकाश के लिए भी कुछ करना है..क्या हम निजी संसथान में किसी शिक्षक को सिर्फ पैसा देकर आराम से सो जाते हैं की अब पढ़ाना उसकी जिम्मेदारी है हम भले ही सोते रहे कदापि नहीं हम देखते है की अगर हमने संसथान को इतना पैसा दिया है तो हमें उसके बदले इतनी पढाई चाहिए और अगर ना मिले तो शिक्षक के साथ संस्था का भी विरोध करते है लेकिन क्या मत का प्रयोग करने के बाद हम ये काम करते हैं , नहीं करते आराम से सो जाते है , कुछ गलत हुआ तो व्यवस्था को गाली देते है, नेताओ को गाली देते है , चौराहे पे बैठ क विकास की बात कर के समय व्यतीत करते हैं और जा के अपने घरो में सो जाते हैं.. युवा वर्ग इसके लिए सबसे जादा जिम्मेदार हैं..युवाओ में बढती भोग लिप्सा, निज कल्याण और स्वार्थ की भावना ने उनकी बुद्धि कुंद कर दी है वे भूल गए हैं की वे ना वर्तमान का नैतिक निर्माण कर रहे हैं ना भविष्य का..वे पश्चिमी सभ्यता में इतना रत हो रहे हैं की ये भूल रहे हैं की आने वाला भविष्य भी वैसा ही होगा जिसमे नैतिक चरित्र का लोप होगा और जैसा की मैंने आरम्भ में कहा है किसी भी सिद्धांत से केवल हम विकास नहीं कर सकते क्यूंकि वो सिद्धांत हमेशा से मानव चरित्र के अधीन है.. विद्या और बुद्धि अब सेवा के अधीन नहीं स्वार्थ के अधीन हो गए हैं, ये तत्त्व-निरूपण और विद्या-प्रसार के साधन ना होकर धनोपार्जन का मंत्र बन गए.. आइये हम मिल के प्रण करें की सिर्फ community की रोचकता बनाये रखने के लिए नहीं अपितु सचमुच विकाश के लिए कुछ कड़े कदम एक साथ मिल के उठाएं..!! ये सदैव याद रखें ज्ञानी, महान और अज्ञानी में फर्क केवल इतना है की ज्ञानी निति , सिद्धांत और दर्शन को व्यवहारिक जीवन में उतार के ही महान बनता है जबकि अज्ञानी और मूढ़ केवल ज्ञान की बातें करते हैं..! यदि मेरे लेख से किसी को भी निजी आघात पंहुचा हो तो मै क्षमा प्रार्थी हूँ..!! मेरा उद्धेश्य किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं..धन्यवाद्..!!
Rahul Ranjan...

6 comments:

  1. सत्य की आवाज़ बुलंद करने के लिए बहुत बहुत मुबारक...जिन्दी ब्लॉग जगत की इस सरस दुनिया में आपका स्वागत है...उम्मीद है की अप सत्य निष्ठा बनाये रखेंगे....!

    ReplyDelete
  2. गलती के लिए क्षमा चाहता हूँ...ऊपर के कमेन्ट में हिंदी ब्लॉग जगत पढ़ा जाये....!

    ReplyDelete
  3. character is great

    ReplyDelete
  4. हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए हमारी शुभकामनाएं !!

    ReplyDelete
  5. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

    ReplyDelete